विचारों की कोई भाषा नही होती
बहुत हैं यहाँ जो अशार नहीं जानते ॥
उनसे वफ़ा की नहीं उम्मीद
जो ऐतबार नही जानते ॥
नही आता उन्हें जीत का मज़ा
जो तजुर्बा -ए -हार नहीं जानते ॥
अज़ाब -ए-मुफलिसी उन्हें क्या समझायें
जो जान-ए-ज़ार नहीं जानते ॥
चंद लोग ही ज़िंदा बचे हैं यहाँ "भरत"
जो रिश्तों का कारोबार नही जानते ॥
बहुत हैं यहाँ जो अशार नहीं जानते ॥
उनसे वफ़ा की नहीं उम्मीद
जो ऐतबार नही जानते ॥
नही आता उन्हें जीत का मज़ा
जो तजुर्बा -ए -हार नहीं जानते ॥
अज़ाब -ए-मुफलिसी उन्हें क्या समझायें
जो जान-ए-ज़ार नहीं जानते ॥
चंद लोग ही ज़िंदा बचे हैं यहाँ "भरत"
जो रिश्तों का कारोबार नही जानते ॥
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