अब चलें अपनी राह
बहुत हुआ निर्देशित प्रवाह
ना जाने कहां विचरते रहे
अंजान वादीयों मे घूमते रहे
बिना किसी उद्देश्य के
चलती रही राह
सराय को घर समझने की
भूल होती रही अब तक
सहवासी अपने लगने लगे
रुक गया प्रवाह
अब हुआ अहसास, हूँ मे पथिक
निरंतर चलना ही मेरा कर्म है
पाकर रहूँगा लक्ष्य मेरा
हो चांहे कठिनांईया अताह
2 comments:
Even still water stinks after some time
Very good, Bharat. I liked the lines about "...Sahvaasi apne lagne lage..."
-----minor spelling quibbles ----
athah (not atah)
vaadiyon (not vaadeeyon)
Post a Comment