me and me
Tuesday, October 10, 2006
गज़ल 3
जिंदगी जीने के काबिल नहीं
पर मौत से कुछ हासिल नहीं
चारागर से क्या उम्मीद रखें
जब चराह से हम ही कायल नहीं
फ़िरुंगा बे-फ़िक्र अर्सा-ए-आलम
अब कोई मेरा हामिल नहीं.
रोटी के चार हर्फ़,कुछ पन्ने किताबों के,
जिंदगी से कुछ और हासिल नहीं.
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